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कोरोना :प्राकृतिक है या कृत्रिम (Man Made) ?

      कोरोना :प्राकृतिक है या कृत्रिम (Man Made)  ?  वैक्सीन लगने के पहले वाला कोरोना प्राकृतिक था और बाद वाला कृत्रिम !प्राकृतिक कोरोना 16 नवंबर 2020 से समाप्त हो गया था जबकि कृत्रिम कोरोना तब तक रहेगा जब तक वैक्सीन लगेगी !   कोरोना को ठीक ठीक समझे बिना कैसे बनाई जा सकती है वैक्सीन आदि कोई भी औषधि ?    चिकित्सा सिद्धांत के अनुसार सामान्य रोगों में ऐसा देखा जाता है कि किसी रोगी की चिकित्सा करने से पूर्व सबसे पहले रोग और रोगी को ठीक ठीक समझना होता है उस समझ के आधार पर ही रोग एवं रोगी के बिषय में चिकित्सक कुछ अनुमान लगाते हैं वे अनुमान जितने प्रतिशत सच निकलते हैं उस रोग को समझने में उतने प्रतिशत उस चिकित्सक को सफलता मिली है ऐसा माना जाता है और रोग को समझने में जितने प्रतिशत सफलता मिल पाती है उस रोग की सफल चिकित्सा कर पाना उतना ही आसान होता है |जहाँ तक कोरोना महामारी की बात है तो कोरोना महामारी को समझ पाने में अंत तक सफलता नहीं मिल सकी है यही कारण है कि महामारी के बिषय में जितने भी प्रकार के अंदाजे रिसर्चरों के द्वारा लगाए गए वे सच...

गणितविज्ञान

         आकाशवाणियाँ अभी भी होती हैं कोरोना महामारी के बिषय में भी आकाशवाणी होती रही थीं |     आकाशवाणियाँ अभी भी होती हैं किंतु उनकी भाषा न समझ पाने के कारण लगता है कि शायद आकाशवाणियाँ होनी ही बंद हो गई हैं |वस्तुतः आकाशवाणियों की कोई भाषा नहीं होती है अपितु संकेत होते हैं जो चराचर प्रकृति में प्रकट होने लगते हैं ऐसे समय समय पर प्रकट होने वाले उन संकेतों के आधार पर अनुसंधान पूर्वक प्रकृति एवं जीवन से संबंधित भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान लगा लिया जाता है | उन प्राकृतिक संकेतों के बिषय में अनुसंधान उसी महाविज्ञान के द्वारा किया जाता है जिसके द्वारा सूर्य और चंद्रग्रहण जैसी बड़ी आकाशीय घटनाओं के बिषय में सही एवं  सटीक पूर्वानुमान हजारों वर्ष पहले ही लगा लिया जाता रहा है |      ऐसी आकाशवाणियों के आधार पर ही कोरोनामहामारी के बिषय में मैंने बहुत पहले पूर्वानुमान लगा लिया था कि कोरोना का संक्रमण किन किन तारीखों में बढ़ेगा और किन तारीखों में कम होगा और कब  पूरी तरह से समाप्त होगा ...

कोरोना महामारी पर सबसे बड़ा रिसर्च (वैदिक)

                                               प्रायः सभीप्रकार के रोगों के दो ही प्रमुख कारण  होते हैं पहला भ्रष्टाचार और दूसरा ब्यभिचार !ये दोनों ही बड़े विकार सभी स्त्री पुरुषों के लिए रोग कारक होते हैं किसी के व्यक्तिगत जीवन में इस प्रकार के विकार यदि बहुत अधिक बढ़ जाते हैं तो उसके शरीर में अनेकों प्रकार के ऐसे कठिन रोग होने लगते हैं जिनसे मुक्ति मिलना अत्यंत कठिन होता है |ऐसे लोग यदि  भ्रष्टाचार और ब्यभिचार से उपरत होकर प्रायश्चित्त पूर्वक उचित आहार बिहार के साथ आस्तिक भावना से संयमित जीवन जीने का अभ्यास करने लगते हैं तो ऐसे रहन सहन से क्रमशः रोग मुक्त होते चले जाते हैं किंतु जो लोग औषधियों के बल पर ऐसे रोगों से मुक्ति पाना चाहते हैं उन्हें निराशा ही हाथ लगती है क्योंकि उनका जीवन रोगी रहते हुए ही पूरा होता है इसलिए उन्हें औषधियों के आधीन रहकर ही यथा सं...

भ्रष्टाचार से पैदा होती हैं महामारियाँ !

     सरकारी काम काज में भी पारदर्शिता पूर्ण ईमानदारी होनी चाहिए !ये सभी को पता है कि जनता का जो विश्वास सरकारी स्कूलों, सरकारी अस्पतालों,सरकारी टेलीफोनों एवं सरकारी डॉकव्यवस्थाओं ने खोया है जनता का वही विश्वास प्राइवेट स्कूलों प्राइवेट अस्पतालों प्राइवेट मोबाइल कंपनियों एवं प्राइवेट कोरियर सेवाओं ने जीत लिया है | स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि यदि स्कूलों,अस्पतालों आदि की तरह ही पुलिस आदि प्रशासन की भी कोई प्राइवेट सुविधा होती तो जनता अबतक सरकारी प्रशासनिक व्यवस्थाओं का भी उपयोग करना बंद कर चुकी होती |      सरकारों के जिन विभागों में जिन लोगों को जो काम सँभालने के लिए रखा गया होता है इसी काम के लिए उन्हें भारी भरकम सैलरी दी जा रही होती है वे अवैध या आपराधिक काम करने वाले लोगों से घूस लेकर सरकार के उद्देश्यों के विपरीत काम कर  रहे होते हैं | गाँवों से लेकर महानगरों तक सरकारी जमीनों पर अवैध कब्ज़ा हो या अवैध निर्माण या अन्य प्रकार का अवैध कामकाज सरकारी मशीनरी के सहयोग या लापरवाही के बिना किया जाना कैसे संभव था और यदि था तो वे करते क्या रहे...

सरकारों को अपने अनुसंधानों की कमजोरियाँ जब पता हैं तो उन्हें जनता से भी उसी पेश आना चाहिए

महामारियां प्राकृतिक आपदाएँ अनुसंधान और सरकारें !      वैज्ञानिकों के द्वारा बताए गए अपरीक्षित आधे अधूरे सच को सच मानकर उसे मानने के लिए सरकारों के द्वारा जनता को न केवल बाध्य किया जाता रहा अपितु जनता पर उन नियमों का पालन न करने के लिए अर्थ दंड भी लगाया जाता रहा जबकि वे नियम वैज्ञानिक अनुसंधान आधारित नहीं थे वे भी उसी प्रकार के लगाए गए अंदाजे थे जो कोरोना काल की विभिन्न परिस्थितियों के बिषय में लगाए गए थे और बाद में गलत निकल गए थे ये अंदाजे कितने विश्वसनीय थे जिनके आधार पर मॉस्क धारण लॉक डाउन जैसे उपायों को अपनाने के  बाध्य किया गया |     इस प्रकार से वैज्ञानिक अनुसंधानों की दुर्बलता  का दंड जनता भोगती रही जिसने समय पर टैक्स देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी थी अब यह जिम्मेदारी सरकारों की होती है कि वे जिस किसी भी प्रकार से जनता की वैज्ञानिक आवश्यकताओं की आपूर्ति सुनिश्चित करें | यदि सरकारों के अपने वैज्ञानिक अनुसंधानों में ऐसी क्षमता नहीं है तो यह कर्तव्य सरकारों का है कि उनके विकल्पों पर बिचार करके उन्हें अवसर दिया जाना चाहिए | वैसे ...

संशयग्रस्त वैज्ञानिकों के द्वारा अच्छे अनुसंधान नहीं किए जा सकते !

       वायुप्रदूषण बढ़े तो उसका कारण खोजने के लिए बिना किसी अनुसंधान के दशहरा में रावण जलने को दीवाली में पटाखे जलाने को होली में होली जलने को सर्दी में हवा रुक जाने को गर्मी में हवा तेज चलने को धन काटते समय पराली जलाने को जिम्मेदार बता दिया जाता है | ऐसे ही ईंट भट्ठे या बाहनों से निकलने वाले धुएँ को जिम्मेदार मानलिया जाता है इसी संशय के आधार पर इन सबके विरुद्ध कार्यवाही शुरू कर दी जाती है | संशय के आधार पर कार्यवाही  पद्धति ठीक नहीं है क्योंकि सौ संशय एक साक्ष्य की बराबरी नहीं कर सकते यह ध्यान रखा जाना चाहिए | किसी क्षेत्र में बाढ़ आए तो उस क्षेत्र के लोगों का लघुशंका करना थोड़ा बंद करवा दिया जाएगा और यदि ऐसे ही थोथे उपाय अपनाने हैं तो अनुसंधानों के नाम पर इतने आडंबर क्यों ?आखिर उन पर किए जा रहे भारी भरकम व्यय का वहन करने के लिए जनता को बाध्य क्यों किया जाए !

कोरोना वैक्सीन पर संशय का कारण भी वैज्ञानिकों के अपने दिए हुए बयान ही थे |

  कोरोना वैक्सीन पर संशय का कारण भी वैज्ञानिकों के अपने दिए हुए बयान ही थे |        कोई व्यक्ति एक तरफ तो कहता रहा हो कि उसे तैरना बिल्कुल ही नहीं आता है और दूसरी तरफ वही व्यक्ति उसी समय समुद्र में तैर लेने का दावा अचानक करने लगे तो संशय तो होगा ही |        कोई चलने फिरने में असमर्थ रोगी व्यक्ति अचानक पहलवानी में पुरस्कार जीतने का दावा करने लगे तो संशय होगा ही !        रसोई के कार्य को बिलकुल न जानने वाला कोई व्यक्ति अपने को बहुत अच्छा रसोइया होने का दावा अचानक करने लगे  तो संशय होगा ही !     भूकंपों के बिषय में कुछ न जानने की बात बोलते रहने वाले वैज्ञानिक श्रेणी के लोग जब अचानक भूकंपों के घटित होने के लिए जिम्मेदार प्लेटों के टकराने को बताने लगते हैं तो संशा तो होगा ही !    मौसम के बिषय में बड़ी बड़ी बातें करने वाले वैज्ञानिक श्रेणी के लोग जब अपनी भविष्यवाणियाँ गलत होने पर जलवायु परिवर्तन का राग अलापने लगते हैं तो जलवायु परिवर्तनपर संशय तो होगा ही |    ऐसे और भी बहुत सारे बिष...