भ्रष्टाचार से पैदा होती हैं महामारियाँ !
सरकारी काम काज में भी पारदर्शिता पूर्ण ईमानदारी होनी चाहिए !ये सभी को पता है कि जनता का जो विश्वास सरकारी स्कूलों, सरकारी अस्पतालों,सरकारी टेलीफोनों एवं सरकारी डॉकव्यवस्थाओं ने खोया है जनता का वही विश्वास प्राइवेट स्कूलों प्राइवेट अस्पतालों प्राइवेट मोबाइल कंपनियों एवं प्राइवेट कोरियर सेवाओं ने जीत लिया है | स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि यदि स्कूलों,अस्पतालों आदि की तरह ही पुलिस आदि प्रशासन की भी कोई प्राइवेट सुविधा होती तो जनता अबतक सरकारी प्रशासनिक व्यवस्थाओं का भी उपयोग करना बंद कर चुकी होती |
सरकारों के जिन विभागों में जिन लोगों को जो काम सँभालने के लिए रखा गया होता है इसी काम के लिए उन्हें भारी भरकम सैलरी दी जा रही होती है वे अवैध या आपराधिक काम करने वाले लोगों से घूस लेकर सरकार के उद्देश्यों के विपरीत काम कर रहे होते हैं | गाँवों से लेकर महानगरों तक सरकारी जमीनों पर अवैध कब्ज़ा हो या अवैध निर्माण या अन्य प्रकार का अवैध कामकाज सरकारी मशीनरी के सहयोग या लापरवाही के बिना किया जाना कैसे संभव था और यदि था तो वे करते क्या रहे और यदि कुछ नहीं करते रहे तो सरकार उन्हें सैलरी क्यों देती रही ?सरकार ऐसी किसी व्यवस्था का सृजन क्यों नाकाम रही जिससे उन पर अंकुश लगाया जा सका होता !सरकारों में सम्मिलित लोग अपनी अयोग्यता के कारण ऐसा करने में सफल नहीं हुए या कि वे स्वयं ऐसे भ्रष्टाचारों में सम्मिलित थे !
यदि ऐसा नहीं था किसी नेता के पहला चुनाव लड़ते समय और किसी सरकारी की नौकरी लगने के पहले दिन इन दोनों के पास जितनी धनराशि या संपत्तियाँ थीं उसके आगे हुए उनकी संपत्तियों के विस्तार का उनके आय स्रोतों से कितना मेल खाता रहा है समय समय पर इसका मूल्याङ्कन भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए था | सरकारें यदि ईमानदार होती हैं तो वर्तमान समय नेताओं के निजी सचिव तक करोड़ों की कोठियाँ खड़ी करने में कैसे सफल हो जाते हैं ये सरकारों में सम्मिलित आत्ममंथन का बिषय है |
अधिकारी और अपराधी एक सिक्के के दो पहलू होते हैं जब एक कमजोर पड़ता है तब दूसरा बलवान हो जाता है किसी भी देश प्रदेश में अपराधों का ग्राफ बढ़ने का मतलब होता है कि अधिकारियों के कमजोर होने और अपराधियों के बलवान दुष्परिणाम है | ऐसी परिस्थिति में अधिकारी कई बार कमजोर कई बार लापरवाह कई बार घूसखोर हो जाते हैं | कई बार भ्रष्टसरकारों के आधीन होने के कारण अपराधों को रोकने में इसलिए नाकाम होते हैं क्योंकि सरकारों में सम्मिलित लोगों के लोग ही उन अपराधों को करने वाले होते हैं जिनके सामने प्रशासन को मूकदर्शक बनकर अपराधों को होते केवल देखते रहने देना होता है |कुलमिलाकर सरकारी सेवाओं के बिषय में लोग आजकल ऐसा सोचने लगे हैं कि नौकरी लग जाने के कारण सैलरी तो मिलनी ही होती है ऊपर से काम करवाने के लिए जनता को घूस देनी होती है | जनता के घूस न देने के कारण सरकारी कर्मचारी यदि जनता का काम न करे तो जनता उसका क्या बिगाड़ सकती है जनता जिससे शिकायत कर सकती है वो भी तो सरकारी कर्मचारी ही होता है वही सरकारी खून उसकी भी रगों में दौड़ रहा होता है |ऐसी परिस्थिति में उससे शिकायत करने का जोखिम जनता किसी भी प्रकार से नहीं उठाना चाहती है |वैसे भी जो व्यक्ति जिसको लाभ या हानि नहीं पहुँचा सकता है उसकी बात मानने या न मानने के लिए बिल्कुल स्वतंत्र होता है | सरकारी कर्मचारियों के साथ जनता का इसी प्रकार का संबंध होता है इसलिए काम करवाने के लिए घूस देने के अतिरिक्त उनके पास और अधिक विकल्प होते नहीं हैं |
प्रजा देश के प्रत्येक व्यक्ति की इच्छाएँ एवं आर्थिक आवश्यकताएँ लगभग एक सामान होती हैं भोजन वस्त्र आवास औषधि पद प्रतिष्ठा शिक्षा विवाह संतान आदि से संबंधित चिंताएँ भी सभी की एक जैसी होती हैं और यदि उनका सही उपयोग करने वाली सरकारें हों तो उनका देश और समाज के प्रति योगदान भी एक जैसा हो सकता है इसलिए सेवाकाल में उनकी औसतआय एवं एक निश्चित उम्र होने के बाद उनकी पेंसन आदि की व्यवस्था भी एक समान ही होनी चाहिए | क्योंकि वृद्धापन तो सभी का आता है फिर पेंशन भी सभी को मिलनी चाहिए !लोकतंत्र में किसी को किसी दूसरे कम आंकने की भूल नहीं की जानी चाहिए !प्रजा प्रजा में भेद करना महापाप होता है | सरकार चाहे तो लोगों की शिक्षा एवं इनके जनहित में किए जाने वाले योगदान आदि का मूल्यांकन करते हुए उन विशेष लोगों की सैलरी पेंसन आदि आम आदमी की औसत आय से अधिकतम 4 गुना तक ही बढ़ाई जानी चाहिए ताकि प्रजा प्रजा में भेद की खाई अधिक चौड़ी न होने पाए |
भ्रष्टाचार मुक्त देशों की प्रतिरोधक क्षमता इतनी अधिक होती है कि महामारियों का दुष्प्रभाव वहां नहीं पड़ता है सरकारें यदि अपने दायित्व का निर्वाह उचित प्रकार से करें तो प्रजा खुशहाल हो सकती है और उत्पीड़न रहित प्रजा की प्रसन्नता महामारियों को रोकने लायक सबसे मजबूत प्रतिरोधक क्षमता तैयार करती है
लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति का सामान योगदान एवं सामान अधिकार होता है इसलिए सरकारों को ऐसी ऐसी नीतियों का निर्माण करना चाहिए जिससे सरकारी और गैरसरकारी किसान मजदूर आदि लोगों की औसत आमदनी के लिए एक समान आवश्यकताओं नीतियों का निर्माण किया जाए शिक्षितों और अशिक्षितों
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